मन............इक पश्मोपेश

आज न जाने क्यूँ अचानक, कुछ लिखने का है मन,
दिल में बरसो की यादें है दफ़न,
सोचता हूँ उन्हें अंदर ही रहने दूँ,
पर जिऊंगा कैसे मासूम है ये मन,
इसमें दबी है सैकड़ो अंजुमन,
आज न जाने क्यूँ अचानक, कुछ लिखने का है मन.........

कभी मैं सोचता हूँ की ये सब यूँ ही चलता रहे,
जिंदगी का करवा यूँ ही बढ़ता रहे,
पर आज हकीकत से सामना करता हूँ मैं,
रोज़ जीता और रोज मरता हूँ मैं,
कोई तो सुनो मेरी ये धङकन,
आज न जाने क्यूँ अचानक, कुछ लिखने का है मन......

दुनिया के इस रंग बिरंगे मेले में,
हर किसी का चेहरा है रंगा हुआ,
इन् चेहरों को रंगा ही रहने दो,
गर साफ़ किया तो भेद खुल जाएंगे,
और हम यूँ ही खड़े रह जायेंगे सन्न,
आज न जाने क्यूँ अचानक, कुछ लिखने का है मन........... 

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